हे हमारे पिता,
तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र किया जावे, तेरा राज्य आवे, तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में है वैसे प्रथ्वी पर भी होवे !
हमारा प्रतिदिन का आहार हमें दे और हमारे अपराध हमें क्षमा कर, जैसे हम भी अपने अपराधियों को क्षमा करते है, और हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा !
-आमीन।
हे प्रभु मुझे अपनी शांति का संवाहक बना ! जहाँ अपकार भावना हो, वहाँ मैं अपकार करूँ ! जहाँ मतभेद हो, वहाँ एकता बनाऊँ, जहाँ शंका हो वहाँ श्रृद्धा, जहाँ निराशा हो वहाँ आशा, जहाँ अंधकार हो वहाँ प्रकाश और जहाँ दुःख हो वहाँ आनन्द का संचार करने दे !
हे दिव्य गुरु मुझ पर ऐसी कृपा कर कि मैं सांत्वना पाने की अपेक्षा सांत्वना देने का प्रयत्न करूँ ! कोई मुझे समझे, इसकी अपेक्षा मैं दूसरो को समझूँ ! कोई मुझसे प्रेम करे, इसकी अपेक्षा मैं दूसरों से प्रेम करूँ ! क्योंकि दान में ही प्राप्ति मिलती है ! क्षमा करने से ही क्षमा मिलती है और मरण में ही हम अनन्त जीवन प्राप्त करते है !